Saturday, August 13, 2022
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सुन ना पाने के बावजूद आईएएस अधिकारी बन मनीराम शर्मा ने पूरे समाज के लिए पेश की मिसाल..

विपरीत परिस्थितियों में कुछ लोग टूट कर बिखर जाते हैं तो कुछ लोग कड़ी मेहनत से रिकॉर्ड तोड़ कामयाबी हासिल करते हैं ।सभी के जीवन में कोई न कोई समस्या तो जरूर होती है। खासतौर पर जब हम कामयाबी किस दिशा में होते हैं। तब प्रकार की अटकले आती है कभी गरीबी से कभी विकलांग होने की वजह से लोगों के लिए जीवन चुनौतीपूर्ण होता जाता है, लेकिन इन सबके बावजूद यदि कोई निरंतर सही दिशा में प्रयत्न करता है तो एक दिन उसे सफलता जरूर मिलती है।


जीवन में ऐसे कई लोग मिल जाते हैं, जो अपनी शारीरिक अक्षमता के कारण खुद को ही समझ लेते हैं। और हिम्मत घर के आगे बढ़ने सोचते नहीं है। आज हम एक ऐसे ही वही व्यक्ति का जिक्र कर रहे हैं जिसके पिता पेशे से मजदूर थे और इनकी माता को आंखों से दिखाई नहीं देता था इन सब के बावजूद उन्होंने अपनी शारीरिक अक्षमता को ध्यान ना देते हुए कठोर परिश्रम किया और इसके बलबूते एक बड़ी कामयाबी हासिल की।

आर्थिक और शारीरिक रूप से कमजोर होते हुए कामयाबी पाई
मनीराम शर्मा के पिता और दृष्टिहीन माता के बधिर बेटे मनीराम शर्मा जिसका हम जिक्र कर रहे हैं। उनका नाम है। मनीराम शर्मा 1975 में राजस्थान के अलवर जिले के बंगड़ी नामक जिले में पैदा हुए थे। उनके निहायती गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने न केवल गरीबी को झेला। बल्कि इनके परिवार के दो सदस्य शारीरिक विकलांगता की समस्या से जूझ रहे थे।

इनके पिताजी मजदूर किया करते थे और इनके पास इतने पैसे मौजूद नहीं थे कि ये अपने बच्चे का ठीक प्रकार से इलाज करा सके ।अच्छा इलाज ना मिल पाने के कारण मनीराम जब 9 वर्ष की आयु के हुए तब इनकी सुनने की क्षमता पूरी तरह से खत्म हो गई लेकिन शारीरिक रूप से अक्षम होने के के बावजूद भी इन्होंने पूरी लगन से पढ़ाई की।

इनके गांव में एक भी विद्यालय मौजूद नहीं था इस वजह से गांव के दूसरे बच्चों को पढ़ने लिखने में खासी दिक्कत होती थी, पर मनीराम ने पढ़ने लिखने की इतनी ललक थी कि वह रोज 5 किलोमीटर तक पैदल ही चलकर गांव के बाहर स्थित एक विद्यालय में पढ़ने के लिए जाया करते थे उन्होंने अपने लगन के बलबूते पर राज्य शिक्षा बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में पांचवा
और 12वीं में सातवां स्थान प्राप्त किया था।

चपरासी की नौकरी मिलने में आड़े में शारीरिक अक्षमता
मनीराम ने दसवीं की परीक्षा पास की तो इनके पिताजी बेहद खुश हुए क्योंकि उन्हें ऐसा लगता था कि मनीराम को दसवीं पास करने के बाद चपरासी की नौकरी तो मिल ही जाएगी। लेकिन जब वह मनीराम के मित्र के घर आए और उन्होंने मनीराम के पिता को 10वीं परीक्षा पास करने के बारे में जिक्र किया तो वहां बेहद प्रसन्न हुए और उनके पिताजी मनीराम को एक विकास पदाधिकारी के पास मिलाने ले गए क्योंकि उनकी इच्छा थे कि उनके बेटे को नौकरी मिल जाए।

उन्होंने विकास अधिकारी से कहा कि कि उनके बेटे को उनकी उनके बेटे ने दसवीं की परीक्षा पास कर ली है तो क्या वह उन्हें चपरासी की नौकरी पर रख लेंगे तो इस पर ऑफिसर ने कहा कि यह तो सुनने में सक्षम नहीं है ऐसे ना तो स्कूल की घंटी सुनाई देगी और ना ही किसी की आवाज सुन पाने में सक्षम है। ऐसे में भला कोई कैसे इसको चपरासी बनाएगा?”

इस पर मनीराम की पिता की सारी उम्मीदें टूट गई और उनकी आंखों में आंसू आ गए लेकिन ऑफिसर शायद ये नहीं जानता था कि जाने अनजाने में चपरासी की नौकरी से मना देकर इन्होंने मनीराम को आगे ले के रास्ते की ओर प्रशस्त किया था। मनीराम को उस दिन चपरासी की नौकरी हासिल हो जाती ,तो शायद वह आईएएस ऑफिसर बनने का ख्वाब ना देखते।

पिता से नहीं मांगा पढ़ाई का खर्चा


मनीराम के स्कूल के प्रिंसिपल को इस बात का अंदाजा पहले से लग गया था। इसीलिए उनकी इच्छा थी कि मनीराम गांव से बाहर जाकर अपनी शिक्षा पूरी करें ।उन्होंने उनके पिताजी से बात करके मनीराम को आगे की पढ़ाई करने के लिए बाहर भेजने का प्रस्ताव रखा। हालांकि मनीराम गांव से बाहर भी गए लेकिन वहां पढ़ाई लिखाई और रहन-सहन के खर्च को वहन करने में उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा और इसकी खर्च को निपटाने के लिए उन्होंने अपने माता-पिता पर किसी प्रकार का दबाव नहीं बनाया उन्होंने ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का खर्च निकला।

पढ़ाई में होशियार मनीराम जब कॉलेज में दूसरे साल में थे तभी इन्होंने राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन का एग्जाम क्वालीफाई कर लिया जिससे उनको क्लर्क की जॉब हासिल हो गई। वही जब कॉलेज में अंतिम साल में थी तो यह पढ़ाई भी करते रहे इसके साथ ही साथ क्लर्क की जॉब भी करते रहे इन्होंने पॉलीटिकल साइंस में पूरे कॉलेज में टॉप के अंक हासिल किए इसके बाद NET क्वालीफाई करके क्लर्क की जॉब छोड़कर लेक्चरर बन गए

शारीरिक अक्षमता से लड़कर कामयाबी पाई


लेक्चरर मनीराम के लिए सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी लेकिन फिर भी मनीराम अपनी पढ़ाई से संतुष्ट नहीं थे यही वजह है कि इन्होंने PHD करने की ठानी। मनीराम ने राजस्थान यूनिवर्सिटी एमए,एमफिल के स्टूडेंट पढ़ाने के दौरान पॉलिटिकल साइंस में पीएचडी कंप्लीट की।अब इनका लक्ष्य यूपीएससी की परीक्षा को क्वालीफाई करना था । लेकिन यह इतना सहज नहीं था हालांकि मनीराम आईएएस ऑफिसर बनने की इच्छा रखते थे इसलिए उन्होंने साल 1995 में भी यूपीएससी की परीक्षा में अपीयर हुए लेकिन वह प्रीलिम्स में पास नहीं हो सके।

उसके बाद उन्होंने 2005 में तीसरे प्रयास में यूपीएससी की परीक्षा क्वालीफाई की, लेकिन दुर्भाग्य से उनकी शारीरिक अक्षमता आड़े आ गई। आखिरकार वे बधिर होते हुए भी इन्होंने 2005 में आईएएस ऑफिसर बनने का ख्वाब पूरा किया,लेकिन अपनी शारीरिक अक्षमता के कारण इनको जॉब ना मिली

सफलता पाने के लिए ये रहा प्रयत्न


मनीराम ने 2006 में दोबारा प्रयास किया और एक बार इस परीक्षा में सफल हुए।वही इनको पोस्ट एंड टेलीग्राफ अकाउंट जैसा एक छोटा पद प्रदान किया गया और उन्होंने इस जॉब को स्वीकार भी कर लिया अब मनीराम को इस बात का अंदाजा हो गया था कि जब तक वह अपनी शारीरिक अक्षमता का इलाज नहीं कर लेते तब तक इनका लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता इसीलिए उन्होंने डॉक्टर से पता लगाया कि इनको क्या दिक्कत है और क्या इलाज के जरिए इनकी सुनने की वापस आ सकती हैं ।इस पर उन्हें डॉक्टर ने बताया कि यदि उनके कान का ऑपरेशन सफल हो जाए तो आपकी सुनने की शक्ति वापस आ सकती है ।लेकिन इस ऑपरेशन के लिए उन्हें 7.5 लाख रुपए इकट्ठे करने होंगे ।मनीराम के पास इतने पैसे मौजूद नहीं थे कि वह अपना इलाज करवा सकें, लेकिन इन्होंने कोशिश करके पैसे इकट्ठे किए और अंत में सफलता हासिल की।

अपने क्षेत्र के सांसद और विभिन्न संगठनों के अलावा आम लोगों की मदद के जरिए इनके ऑपरेशन के लिए पैसा जुटाया गया और कान के ऑपरेशन में सफलता मिली इनकी सुनने की शक्ति वापस आ गई अब इन्होंने अपने लक्ष्य की ओर पूरी तरह से ध्यान केंद्रित किया वहीं 2009 में इन्होंने दोबारा से यूपीएससी का एग्जाम क्लियर किया। इस तरह से मनीराम ने 15 साल की प्रतीक्षा लगन और मेहनत का परिणाम मिला। ये बड़े आईएएस ऑफिसर बने

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